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मैं सी पी दीक्षित मेरा जन्म स्थान उत्तर प्रदेश के इटावा जिले की बिधूना तहसील1966 में हुआ था मैं एक बहुत ही गरीब ब्राम्हण परिवार में पैदा हुआ था मैं पांच भाइयों व एक बहिन में सबसे छोटा भाई था थोड़ी सी जमीन थी उसी से जैसे तैसे गुजारा होता था जब पिता जी ने भाइयों को पढ़ाने के लिए जमीन तक गिरवी रख दी मुझसे भी कहा कि तुम भी पढ़ लो जो जमीन बची वो भी गिरवी रख देंगे मुझसे उनकी ये लाचारी देखी नहीं गई और मैंने मना कर दिया जिन भाइयों के लिए जमीन गिरवी रख दी वो भी कहीं भी सैटल नहीं हो सके तो मैं आपके बुढ़ापे की सहारा जमीन को क्यों आपसे छीन लूँ फिर मैंने वही से हाई स्कूल करके संस्कृत विद्यालय में उत्तर मध्यमा जो कि इलाहाबाद बोर्ड के इंटर मीडिएट के समकक्ष था, फिर मैंने लखनऊ के बख्सी तालाब से आई टी आई की, फिर वर्ष 1975,76 में दिल्ली चला आया, केवल 50,रुपये लेकर आ गया था,मेरी मौसी के दामाद दिल्ली में इंजीनियर इंडिया लिमिटेड में काम करते थे और साउथ एवेन्यू एम पी फ्लेट में किराये पर रहते थे जो कि बहुत ही छोटा था वहाँ केवल चार दिन रुकने के बाद गांव jane की कहकर चला आया लेकिन गांव नहीं गया अब केवल 15,रुपये शेष बचे थे फिर मैं दरियागंज में आ गया वहां सिलाई फैक्टरी में मुझसे बड़े भाई सिलाई करते थे एक्सपोर्ट का काम होता था साथ में गॉव के और भी चार कारीगर थे।शेष अगले दिन

लेकिन मेरे भाई ने कोई भी मदद नहीं की साफ बोल दिया कि मैं अपने साथ नहीं रख सकता हूँ, रात भर पार्क में बैठा रहा, सुबह सिलाई फैक्टरी पटेल नगर में बैकेन्सी अखबार में देखकर पहुंचा तो वो सिलाई का काम मैं नहीं कर सकता था तो वहीं पर राजस्थान का एक कारीगर मिल गया उसने मुझसे बात की और अपने साथ ले गया वो पति पत्नी व एक साल का बच्चा था एक चारपाई की जगह थी तो मुझे बाहर चारपाई पर लिटाया व खुद जमीन पर लेटे फिरफिर वो दो दिन बाद नारायणा फैक्टरी में ले गया और वहां 300,रुपये महीने पर रख लिया फिर मैं उसी फैक्टरी में रहने लगा फिर मेरी ईमानदारी देखकर मुझे पूरी फैक्टरी की चावी दे दी फिर वहां पर मुझे सुपरवाइजर बना दिया गया फिर दिन में वहां व शाम 3से 6,बजे तक दूसरी जगह कटिंग मास्टर का काम करने लगा उनका माल अमेरिका जाता था फिर करीब दो साल बाद भाइयों में झगड़ा होने के कारण फैक्टरी बन्द हो गई फिर मैं दूसरी जगह 600,रुपये महीने पर कटिंग मास्टर की नौकरी करने लगा और इंद्रपुरी जे जे कॉलोनी में किराए पर रहने लगा व वहीं पर पाँच सिलाई मशीनें किस्तों पर लेकर लगा दी इस तरह 20,मशीनें लगा दी इंद्रपुरी में ही वर्ष 1978, में ही लव मैरिज कर ली फिर ससुराल में ही रहने लगा करीब एक साल तो सही रहा लेकिन सास की बात पर दख़ल अंदाजी बढती गईं फिर वर्ष 1979 पुत्री का जन्म हुआ और वर्ष 1981को पुत्र का जन्म हुआ पत्नी प्रेम गीता व कमल पुत्री व पुत्र थे फिर नारायणा गॉव में 60,सिलाई मशीन हो गई थी लेकिन सास ने जीना दूभर कर दिया था पत्नी अपनी माँ का ही पक्ष लेती थी।

फिर मैं बहुत ही परेशान हो गया और मैंने नारायणा विहार में किराए पर बच्चों के खातिर फ्लैट ले लिया और ससुर से लड़की भेजने को बोला लेकिन उनको भी सास ने गुलाम बना रक्खा था और सास कहने लगी कि जब तू अपना मकान खरीद लेगा तभी लड़की को तेरे साथ भेजूंगी मैं स्वाभिमानी बर्दाश्त नहीं कर सका और वर्ष 1983,में विकासपुरी में प्लॉट खरीदा, व 1984,में बनाकर रहने लगा, लेकिन जो बीमारी यहां थीं वो जैसी की तैसी ही बनी रही पत्नी अपने साथ माँ बाप को भी ले आई, मकान देखकर उन माँ बेटी का लालच इतना बढ़ गया कि अपने बदमाश किस्म के रिश्तेदार आदि को बुलाने लगी और मकान के लालच में मुझे रास्ते से हटाने के लिए साजिशें रचने लगी और पत्नी को बाहर भेजने लगी जिस कारण उसके बड़े बड़े लोगों से संपर्क हो गए मैंने बच्चों की जिंदगी के खातिर बहुत समझाया लेकिन वो इतना आगे निकल चुकी थी कि पीछे लौटना मुमकिन नही था फिर मैंने मकान अपनी बड़ी बहन के नाम ट्रांसफर कर दिया और वर्ष 1990, कानपुर आ गया लेकिन दिल्ली कानपुर आना जाना लगा रहता था फिर मैंने पत्नी को कानपुर में रहने के लिए बोला लेकिन वो तैयार नहीं हुई फिर 1995, में वकील द्वारा नोटिस भिजवाया कि या तो कानपुर आकर रहिए बरना तलाक लीजिए तो कहने लगी मुझे केवल मकान से मतलब है दीक्षित से नहीं फिर मैंने कानपुर कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल की फिर भी सम्मन जारी तीन बार होने पर नहीं आई फिर फैमिली कोर्ट के जज ने 1997, में एक्सपार्टी तलाक की डिग्री जारी कर दी फिर मकान बहिन ने कोर्ट के द्वारा मई 2005, में खाली करवा लिया करीब 30, महीने बन्द रहने के बाद 2007, में कोर्ट व पुलिस की मिलीभगत से 14, ताले व तीन बेल्डिंग सीलें तोड़कर जबरन कब्जा करवा दिया गया है

महिला के बेहद घिनौने काले कारनामों से पूरा विश्व अचंभित रह जायेगा वर्ष 2008,में मुझे फंसाने के लिए एक बहुत ही गरीब अल्पसंख्यक मजबूर असहाय लड़की का अपहरण गैंगरेप हत्या दिल्ली से ले जाकर कानपुर में हत्या करवा दी व उसकी छोटी बहन माँ को भी इन जल्लादों ने मरवा दिया जिससे मकान व जमीन आसानी से हड़प सकें फिर मैंने इन खूंखार आतंकी शैतानों से संघर्ष करने की ठानी ताकि उन गरीबों मजबूरों को न्याय मिल सके मेरी संघर्षों की कहानी वर्ष 2008,से शुरू होती है,अब विश्व का सबसे बड़ा बेहद गंभीर व पहला महाघोटाला बन चुका है जो 15, सालों का पूरे विश्व में भूचाल ला देगा।

मैंने ये सारा मामला महाघोटाला अपने इष्टदेव बालाजी की अदालत में डाल दिया है क्योंकि इन शैतानों से कोई भी इंसान टक्कर नहीं ले सकता था इसीलिए विश्व की सबसे बड़ी पापियों शैतानों का अन्तिम संस्कार करने वाली अदालत में डाल दिया है मैं तो केवल माध्यम हूं संघर्ष तो खुद मेरे इष्टदेव बालाजी कर रहे हैं जिनको विश्व में अभी कोई भी हराने वाला पैदा ही नहीं हुआ है और न होगा इसीलिए अंतिम जीत सत्य की ही होगी। संघर्षों के लिए आत्मविश्वास सच्चाई ईमानदारी दृढ़ संकल्प और धैर्य बहुत ही जरूरी हैं। जनता राज के सात तत्व हैं निस्वार्थ सेवा भाव, समानता, जवाबदेही, सच्चाई, ईमानदारी, निष्पक्षता व उदारता तभी ईश्वर आपका साथ देंगे क्योंकि मैंने संघर्ष अपने लिए नहीं किया है देश व विश्व को बचाने के लिए ही किया है तभी सभी ने मेरा साथ छोड़ दिया है लेकिन सच्चा साथ मेरे साथ है तभी तो 15, सालों से निडर निर्भीक निष्पक्ष होकर संघर्ष कर रहा हूं लालच मुझे नाममात्र भी नहीं है क्योंकि हर शैतानी समस्या ब अपराध की जड़ ही लालच है दीक्षित।

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